Monday, June 1, 2020
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राजस्थान के लोकदेवता (सभी 22 लोकदेवता)

राजस्थान के लोकदेवता से जुड़े प्रश्न राजस्थान के लगभग सभी परीक्षाओं में पूछे जाते है। आशा करते है ये जानकरी आप सभी के काफ़ी काम आएगी।

रामदेव जी

राजस्थान के लोकदेवता, रामदेव जी
राजस्थान के लोकदेवता रामदेव जी

राजस्थान के लोकदेवता रामदेवजी का जन्म बाड़मेर के शिव तहसील के ऊंडकासमेर गाँव में भाद्रपद शुक्ल दूज (द्वितीया) को हुआ था। रामदेव जी के पिता का नाम अजमाल जी तँवर तथा माता का नाम मैणादे था। ये अर्जुन के वंसज माने जाते है।

रामदेव जी ‘रामसा पीर’, ‘रूणिचा रा धणी’, ‘बाबा रामदेव‘ आदि उपनामों से भी जाने जाते है। रामदेव जी के गुरु का नाम बालीनाथ था। रामदेव जी का विवाह अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) सोढा, दलेल सिंह जी की सुपुत्री नेटलदे/निहालदे के साथ हुआ था।

रामदेव जी को मेघवाल जाति के भक्त रिखिया कहलाते है। हिन्दू रामदेव जी को “कृष्ण का अवतार” मानकर तथा मुसलमान “रामसा पीर” के रूप में इनको पूजते है। रामदेव जी की अवतार तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया “बाबे रि बीज/दूज” के रूप में लोकप्रचलित है।

रामदेव जी की मंदिरो को “देवरा” कहा जाता है, जिन पर श्वेत या 5 रंगो की ध्वजा फहराई जाती है जिसे “नेजा” कहा जाता है। रामदेव जी एक मात्र एसे राजस्थान के लोकदेवता है जो कवि भी थे इनकी रचना “चौबीस बाणिया” प्रसिद्ध ग्रंथ है।

रामदेव जी के नाम पर भाद्रपद द्वितीया व एकादशी को रात्रि जागरण किया जाता है, जिसे ‘जम्मा’ कहते है। बाबा रामदेव जी के चमत्कारों को पर्चा‘ कहा जाता है। पर्चा शब्द परिचय शब्द से बना है। परिचय शब्द से तात्पर्य है अपने अवतारी होने का परिचय देना।

रामदेव जी के पगल्ये (चरण चिन्ह) प्रतीक चिन्ह के रूप में पूजे जाते है। रामदेव जी के भक्त कपड़े से बना घोड़ा चढ़ाते है। मेघवाल जाती की कन्या डालिबाई को रामदेवजी ने धर्म-बहिन बनाया था/ डालिबाई ने रामदेवजी के समाधि लेने से एक दिन पूर्व समाधि ली थी।

रामदेव जी की सगी बहन का नाम सुगना बाई था। रामदेव जी के भाई का नाम वीरमदेव था, अजमाल जी की पत्नी मैणादे के श्री कृष्ण के आशीर्वाद से दो पुत्र वीरमदेव व रामदेव का जन्म हुआ था। भगवान कृष्ण की तपस्या के फलस्वरूप जन्म लेने के कारण लोक-कथाओं में दोनो भाइयों को बलराम व कृष्ण का अवतार माना जाता है।

रूणेचा में स्थित रामदेव जी की समाधि स्थल को रामसरोवर की पाल के नाम से जाना जाता है। बीकानेर, जैसलमेर में रामदेव जी की फड़ ब्यावले भक्तों द्वारा बांची जाती है।

रामदेव जी ने मूर्ति पूजा, तीर्थयात्रा में अविश्वास जताया था तथा जाति प्रथा का विरोध करते हुए हरिजनो को गले का हार, मोती और मूंगा बताते है। राम देव जी का वाहन “लीला घोड़ा” था। रामदेव जी हड़बुजी और पाबू जी के समकालीन थे।

रामदेवरा (रूणिचा) जैसलमेर ज़िले की पोकरण तहसील में रामदेव जी का समाधि स्थल है। यंहा रामदेव जी का भव्य मंदिर है तथा यंहा भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक रामदेव जी का मेला भारत है। रामदेव जी के मेले का मुख्य आकर्षण “तेरहताली नृत्य” है, जिसे कामड़िया जाति के लोग प्रस्तुत करते है। रामदेव जी का मेला साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है।

रामदेव जी ने पश्चिम भारत में मतानंतरण व्यवस्था को रोकने हेतु प्रभावी भूमिका निभाई थी। भैरव राक्षस, लखी बंजारा, रत्ना राईका का सम्बन्ध रामदेवजी से था। यूरोप की क्रांति से बहुत पहले रामदेवजी द्वारा हिंदू समाज की दिया गया संदेश समता और बंधुत्व था।

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गोगाजी

राजस्थान के लोकदेवता, गोगाजी
राजस्थान के लोकदेवता गोगाजी

राजस्थान के लोकदेवता गोगा जी का जन्म भाद्रपद मास की नवमी तिथी (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की दूसरे दिन) को चूरू ज़िले के ददरेवा गाँव में हुआ था इस दिन का नाम ‘गुगो’ रखा गया। गोगाजी के पिता का नाम ज़ेवर सिंहमाता का नाम बाछल था।

वीर गोगाजी महमूद गजनवी के समकालीन थे। राजस्थान के पाँच पीरों में गोगाजी का महत्वपूर्ण स्थान है।गोगा जी को ‘जाहरवीर’ के नाम से भी पूजा जाता है। गोगा जी को ‘साँपो के देवता’ के रूप में भी पूजा जाता है।

गोगाजी के ‘थान’ खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होते हैं, जहाँ मूर्ति स्वरूप एक पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित होती है। गोगाजी के घोड़ी का रंग नीला था। सांचोर (जालोर) में गोगा जी का मंदिर है जिसे “गोगाजी की ओल्डी” कहा जाता है।

गोगा जी की स्मृति में भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) को गोगामेड़ी ( नोहर, हनुमानगढ़) में गोगाजी का मेला भरता है। गोगाजी गायों की रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हुए थे।

गोगा जी की मूर्ती गाँव में खेजड़ी वृक्ष के नीचे मिलती है- “गाँव गाँव में खेजड़ी अर गाँव गाँव में गोगाजी”

राजस्थान के लोकदेवता के लिए यह कहावत प्रसिद्ध है

गोगा जी की जन्मस्थली ददरेवा (चूरू) के तालाब कि मिट्टी का लेप करने से साँप का ज़हर उतर जाता है। घरों में गोगा जी की पूजा के समय मिट्टी का घोड़ा बनाया जाता है। गोगाजी के जन्मस्थान ददरेवा (चरू) को शीर्षमेड़ी/ सिद्धमेड़ी तथा समाधि स्थल ‘नोहर(हनुमानगढ़)’ को “गोगामेड़ी या धुरमेड़ी भी कहते हैं।

गोगामेड़ी स्थित मेडी का निर्माण फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने करवाया था। गोगामेड़ी के द्वार पर बिस्मिल्लाह अंकित है। गोगामेड़ी को वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह ने दिया था। गोगामेड़ी की बनावट मक़बरे नुमा है। लोकदेवता गोगाजी ने 11 बार मुसलमानों से युद्ध किया था। गोगाजी के 17 वी पीढ़ी का शासक क़ायम सिंह को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया था।

“यह तो जाहर पीर रहे हैं अर्थात साक्षात देवता के समान प्रकट होता है”

वीर गोगाजी के रण कौशल को देखकर महमूद गजनवी ने कहा

हिन्दू-मुस्लिम एकता एवं संस्कृतियों के आपसी समन्वय की दृष्टि से गोगाजी का विशेष महत्व है। कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार गोगाजी ने अपनी 47 पुत्रों के साथ सतलज नदी पार करते हुए महमूद गजनवी से युद्ध किया था। गोगाजी के मंदिर को फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने मस्जिद का रूप दिया था। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय गोगाजी को जाहर पीर के रूप में पूजते हैं।

गोगाजी के प्रचलित नाम गुगो का शाब्दिक अर्थ है गुगो का प्रथम अक्षर गू- गुरु का तथा गो अक्षर गोरखनाथ से सम्बंधित है। गोगा जी के भोपे डेरू वाद्ययंत्र का प्रयोग करते हैं।

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तेजाजी

राजस्थान के लोकदेवता, तेजाजी
राजस्थान के लोकदेवता तेजाजी

तेजाजी का जन्म नागवंशीय जाट के धौल्यागौत्र के ताहड परिवार में 1074 ई. में नागौर ज़िले के खड़नाल (वर्तमान खरनाल्य) गाँव में माघ शुक्ला चतुरदर्शी के दिन हुआ था । तेजाजी के पिता का नाम ताहड जीमाता का नाम राजकुँवर था। तेजाजी का विवाह पनेर (अजमेर ज़िले में) रायचंद्र की पुत्री पैमल के साथ हुआ था।

तेजाजी की घोड़ी का नाम लीलण (सिणगारी) था। तेजाजी की याद में परबतसर (नागौर) में प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है।साँप के जहर के तोड़ के रूप में गौ मूत्र व गोबर की राख के प्रयोग की सबसे पहले शुरुआत तेजाजी ने की थी।

अजमेर ज़िले के हर गाँव में तेजाजी के थान मिलते है। सुरसुरा (अजमेर) गाँव में तेजाजी को साँप ने डसा था। गाँव का चबूतरा थान कहलाता है, तेजाजी के पूजारी/ भोपे को घुडला कहा जाता है। पुरानी मान्यता के अनुसार भोपे में तेजाजी की आत्मा आ जाती है और वह ज़हर चूस कर सर्प दंश से पीड़ित व्यक्ति को ठीक कर देता है, इसीलिए भोपे को तेजाजी जा घोडला भी कहा जाता है।

लाछा गुज़री की गायों को मेर के मीनाओ से मुक्त करने हेतु तेजाजी ने अपने जीवन को दाव पर लगा दिया था। तेजाजी की कर्मस्थली बूंदी का बासी दुगारी क्षेत्र है। लोकदेवता तेजाजी को काला और बाला का देवताकृषि कार्यों का उपकारक देवता भी कहा जाता है।

तेजाजी को तलवार धारी अश्वारोही की रूप में चित्रित किया जाता है तथा इनकी जिव्हा को सर्प द्वारा डसते हए प्रदर्शित किया जाता है। तेजाजी से सम्बंधित लोक साहित्य को “तेजा टेर” कहा जाता है।

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पाबू जी

राजस्थान के लोकदेवता पाबूजी
राजस्थान के लोकदेवता पाबूजी

लोकदेवता पाबूजी का जन्म 1239 ई. में फलौदी तहसील (जोधपुर) के कोलू गाँव में हुआ था, यही इनका पूजा स्थल भी है।पाबूजी के पिता का नाम धाँधल जीमाता का नाम कमलादे था। ये राठौड़ो के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे। पाबूजी को लक्षमण का अवतार माना जाता है।

पाबूजी राठौड़ राजवंश से सम्बंधित थे। पाबूजी का चिन्ह भाला लिए अश्वारोही है। पाबूजी को ऊंटो के देवता के रूप में पूजा जाता है, ऊंटो के बीमार होने पर पाबूजी की भक्ति की जाती है। ऊंटो की पालक जाति राईका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य मानती है।

पाबूजी का विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री फूलमदे से हुआ था। लोकदेवता पाबूजी देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जींदराव खिंची से छूड़ाते हुए देचु गाँव में वीरगति को प्राप्त हुए। पाबूजी के पवाड़े विशेष रूप से प्रचलित है।

पाबूजी थोरी एंव भील जाति में लोकप्रिय है और मेहरजाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजा करती है। पुरानी मान्यता के अनुसार मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट (सांड) लाने का श्रेय राजस्थान के लोकदेवता पाबूजी को प्राप्त है।

‘पाबूजी की फड़’ नायक जाति के भोपे द्वारा ‘रावणहत्था वाद्ययंत्र’ के साथ बांची जाती है। चांदा-डेमा एंव हरमल पाबूजी के रक्षक सहयोगी के रूप में माने जाते है। आशिया मोड़ज़ी द्वारा लिखित ‘पाबू प्रकाश’ पाबूजी के जीवन पर लिखी महत्वपूर्ण रचना है।

पाबु, हड़बु, रामदेव मंगलिया मेहा ।

पांचू पीर पधारज्यो गूगा जी जेहा ।।

राजस्थान के लोक अंचलो में एक दोहा प्रसिद्ध है

इस दोहे में जिन पाँच पीरो को आने का न्यौता दिया गया है उन राजस्थान के लोकदेवता में पाबूजी सबसे पहले है। शेष चार है – हड़बु जी, बाबा रामदेव, मंगलिया मेहाजी व गोगाजी। पाँचो पीर क्षत्रिय वंश के थे।

पाबूजी की घोड़ी का नाम केसरकालमी था।पाबूजी से सम्बंधित गीत ‘पाबूजी के पवाड़े’ माठ के वाद्य यन्त्र के साथ नायक एवं रेबारी जाति के द्वारा गाए जाते हैं। पाबूजी को बाईं और झुकी हुई पाग से प्रदर्शित किया जाता है। पाबूजी का बोध चिन्ह भाला लिए अश्वारोही है।

पाबूजी का प्रसिद्ध कोलूमंड गाँव में है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भारत है। पाबूजी की प्लेग रक्षक देवता के रूप में भी पूजा जाता है, पाबूजी छुआछूत के भी प्रबल विरोधी थे।

मुस्लिम सुल्तान दूदा सुमरा को पाबूजी ने युद्ध में परास्त किया, क्योंकि यह एक हिन्दू द्रोही व हिंदुओ पर अत्याचार करने वाली प्रवृति का शासक था।

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देवनारायण जी

राजस्थान के लोकदेवता देवनारायण जी
राजस्थान के लोकदेवता देवनारायण जी

लोकदेवता देवनारायण जी का जन्म 1243 ईं. में बगड़ावत परिवार में हुआ था। देवनारायण जी के पिता का नाम सवाई भोज एवं माता का नाम सेडू खटाणी था। देवनारायण जी के पिता सवाई भोज; दुर्जनसाल से लडते हुए वीरगती को प्राप्त हो गए। इनका विवाह राजा जयसिंह की पुत्री पीपलदे के साथ हुआ था।

देवनारायण जी के बचपन का नाम उदयसिंह था। इनका घोडा ‘लीलागर’ था ।गुर्जर जाति के लोग देवनारायण जी को ‘विष्णु का अवतार‘ मानते है। देवनारायण जी की फड़ अविवाहित गुर्जर भोपो द्वारा बांची जाती है। देवनारायण जी की फड राज्य की सबसे प्राचीन व सबसे लम्बी फड है। देवनारायण जी की फड़ में जंतर वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है।

इनकी फड़ पर भारत सरकार द्वारा 1992 में पांच रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। देवनारायण जी पर ( स्वयं पर ) 2011 में पाँच रूपये की डाक-टिकट जारी की गई ।

देवनारायण जी को ‘राज्य क्रांति का जनक‘ माना जाता है। देवनारायण जी ने औषधि के रूप में गोबर और नीम के महत्व को स्पष्ट किया है। इनका मूल ‘देवरा’ आसींद भीलवाड़ा से 14 मील दूर गोठा दडावत में है।
देवनारायण जी के देवरों में उनकी प्रतिमा के स्थान पर बडी ईटों की पूजा की जाती है। देवनारायण जी की पूजा नीम की पत्तियों से होती है ।

देवनारायण जी के अन्य देवरे- देवमाली (ब्यावर, अजमेर) , देवधाम जोधपुरिया (निवाईं, टोंक)देव डूंगरी पहाड़ी चित्तौड़ में है। देवनारायणजी का मंदिर आसींद (भीलवाड़ा) में है जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मेला लगता है।मेवाड शासक महाराणा साँगा का आराध्य देव देवनारायण जी थे इसी कारण देवदूँगरी (चित्तौड़रगढ) मे देवनारायणजी का मंदिर का निर्माण राणा साँगा ने ही करवाया था।

देवनारायण जी ने भिनाय (अजमेर) के शासक को मारकर अपने बड़े भाई “महेंदू को राजा बनाया था। इनके बारे में लोगों का विश्वास है कि इनका जन्म नहीं हुआ था वे कमल के फूल में अवतरित हुए थे । देवनारायण जी ने अपने पिता की हत्या का बदला लिया तथा अपने पराक्रम और सिद्धियों का प्रयोग अन्याय का प्रतिकार करने और जनकल्याण में किया । देवमाली (ब्यावर) में उन्होंने भाद्रपद शुक्ल सप्तमी देह त्यागी ।

हड़बु जी

हड़बु जी का जन्म भूँडेल (नागौर) में हुआ था। हड़बु जी महाराजा सांखला के पुत्र थे तथा मारवाड़ के राव जोधा के समकालीन थे। लोकदेवता रामदेवजी हड़बु जी के मौसेरे भाई थे। हड़बु जी ने रामदेव जी प्रेरणा लेकर योगी बालिनाथ जी से दीक्षा ली थी अतः बालिनाथ जी हड़बु जी के गरू थे।

हड़बु जी का मुख्य मंदिर बेंगटी गाँव (फलौदी) में है। हड़बु जी की गणना पाँच पीरों में से एक में की जाती है। हड़बु जी ‘शकुन शास्त्र के ज्ञाता’ थे तथा सांखला जाति के राजपूत इनके पूजारी होते है। लक्ष्य के प्रति सम्पूर्ण समर्पण एंव अड़िग ध्येय निष्ठा के कारण इन्हें राजस्थान के लोकदेवता माना जाता है।

जोधपुर के शासक राव जोधा ने हड़बुजी को बेंगटी गाँव भेंट किया था क्योंकि हड़बु जी ने मंडोर को मेवाड़ के अधिकार से मुक्त करवाया था।

मांगलिया मेहाजी

राजस्थान के लोकदेवता मेहाजी
राजस्थान के लोकदेवता मेहाजी

मांगलिया मेहाजी इष्टदेव के रूप में जाने जाते है। मेहा जी पाँच पीरों में एक थे। इनका मंदिर बापणी गाँव में है। भाद्रपद में कृष्ण जन्माष्टमी को मांगलिया राजपूत मेहा जी की अष्टमी मनाते है।

राजस्थान के लोकदेवता मेहा जी के बारे में लोकमान्यता है की इनकी पूजा करने वाले भोपा की वंश वृद्धि नही होती और वे गोद लेकर पीठी चलाते है। मेहा जी का घोड़ा “किरड़ काबरा” है। मेहा जी का सारा जीवन धर्म की रक्षा और मर्यादाओं के पालन में बीता।

मेहा जी जैसलमेर के राव राणांगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

कल्ला जी

राजस्थान के लोकदेवता क़ल्ला जी
राजस्थान के लोकदेवता क़ल्ला जी

वीर कल्लाजी राठौर का जन्म (मारवाड़) के सामीयाना गाँव में 1601 ई. में दुर्गाष्टमी को हुआ। कल्लाजी मेड़ता (नागौर) के निवासी थे। वीर कल्लाजी के पिता का नाम आस सिंह था। भक्तिमति मीरां बाई कल्लाजी की बुआ थी । कल्लाजी की कूलदेवी का नाम नागणेची माता था।

वीर कल्लाजी को चार हाथों वाले देवता के रूप में माना जाता है।कल्लाजी के गुरू का नाम भैरवनाथ था। वीर कल्लाजी को औषधि विज्ञान और योगा अभ्यास में विशेष महारथ हासिल थी। कल्लाजी अस्त्र-शस्त्र विद्या में भी पारंगत थे। कल्लाजी को ‘शेषनाग का अवतार’ माना जाता है ।

वीर कल्लाजी की छतरी चितौड़गढ दुर्ग के भैंरवपोल में स्थित है, जहाँ प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ल नवमी को मेला लगता है। चित्तोंड़गढ़ के तीसरे साके में अकबर के विरुद्ध लडते हुए ये वीर गति को प्राप्त हुए।

कल्ला जी की ‘रनेला’ (चित्तौड़) में सिद्ध पीठ है। भूत-पिशाच ग्रस्त लोग, रोगी पशु, पागल कुत्ता, गोयरा, सर्प, आदि विषैले जन्तुओँ से दंशित व्यक्ति या पशु सभी कल्लाजी की कृपा से संताप से छुटकारा पाते है।

राजस्थान के लोकदेवता वीर कल्लाजी की ख्याति केहर, कल्याण, कमधज, बाल ब्रह्मचारी, योगी, कमधण आदि कईं नामों से है।राजकुमारी कृष्ण कुंवर कल्लाजी के शव के साथ रूंडेला गाँव सती हुई

23 फरवरी 1568 में जब अकबर ने चित्तोड़ पर आक्रमण किया तो कल्लाजी ने रण भूमि में जयमल के साथ अकबर की सेना को लोहे के चने चबवा दिए। डूंगरपुर जिले के सामलिया में कल्लाजी की काले पत्थर की मूर्ति हैं ।जहॉ भील कैसर और अफीम चढाते है।

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तल्लीनाथ जी

तल्लीनाथ जी जालौर जिले के अत्यंत प्रसिद्ध लोक देवता है। इनका वास्तविक नाम गांगदेव राठौड था।तल्लीनाथ के पिता का नाम बीरमदेव था। ये शेरगढ़ (जोधपुर) ठिकाने के शासक थे। तल्लीनाथ के गुरू जालन्धर नाथ थे।

मंडोर का राव चूंड़ा तल्लीनाथ जी का भाई था। तल्लीनाथ बाबा प्रकृति प्रेमी थे। अत: इन्हें प्रकृति प्रेमी लोकदेवता भी कहते है। इन्होंने सदैव पेड़-पौधो की रक्षा व संवर्धन पर जोर दिया, इसी कारण पंचमुखा पहाडी पर जहाँ तल्लीनाथ का पूजा स्थल है यंहा कोई पेड़-पौधा नहीं काटता है। जालौर के पाँचोटा गांव के निकट पंचमुखी पहाडी के बीच घोड़े पर सवार बाबा तल्लीनाथ की मूर्ति स्थापित है।

किसी व्यक्ति या पशु के बीमार पडने या जहरीले जीव के काटने पर इनके नाम का डोरां बाँधते है। राजस्थान के लोकदेवता तल्लीनाथ जी को जालौर क्षेत्र के लोग ‘ओरण’ मानते है । पंचमुखा पहाडी पर तल्लीनाथ जी का पूजा स्थल है ।

मल्लीनाथ जी

मल्लीनाथ जी का जन्म मारवाड़ के रावल सलखाँ तीड़ाजी (पिता जी) और जीणन्दे (माता का नाम) के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में 1358 ई. में हुआ था। मल्लीनाथ जी निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे । इनकी पत्नी का नाम रूपादे था । मल्लीनाथ जी के गुरु का नाम डगमसी भाटी था।

तिलवाड़ा (बाडमेर) में मल्लीनाथ जी का प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ हर वर्ष चैत्र कृष्णा एकादशी से पन्द्रह दिन तक मैला भरता है। राज्य का सबसे प्राचीनतम पशु मेला तल्लीनाथ पशु मेला तिलवाड़ा (बाडमेर) में लगता है। मल्लीनाथ जी के ताऊ ‘कान्हड़दे ‘ (मारवाड़ शासक) थे ।मल्लीनाथ जी ने अपने भतीजे राव चूड़ा की मंडोर व नागौर जीतने में मदद की

मल्लीनाथजी को सिद्भपुरुष, चमत्कारिक योद्धा के उपनामों से तथा लोक मानस में इन्हें ‘त्राता’ (रक्षक) के रूप में जाना जाता है। बाडमेर जिले के ‘मालावी’ क्षेत्र का नाम इन्हीं के नाम पर पडा । 1378 में मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को मल्लिनाथ जी ने पराजित किया था ।

मल्लीनाथ जी ने कूडा पंथ की स्थापना की । भगवान श्री मल्लिनाथ जी ने हमेशा सत्य और अहिंसा का अनुसरण किया और अनुयायियों को भी इसी राह पर चलने का सन्देश दिया। फाल्गुन माह शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को 500 साधुओं के संग इन्होनें सम्मेद शिखर पर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त किया था।

लोकदेवता देव बाबा

भरतपुर के नगला जहाज नामक स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी व चैत्र शुक्ल पंचमी को दो बार यहाँ मेला आयोजित होता है। देव बाबा की बहन का नाम एलारी/ऐलादी थी। गुर्जर ग्वालो के प्रति देव बाबा के मन में गहरी श्रृंद्धा थी। देव बाबा को पशुचिकित्सा का अच्छा ज्ञान था। देव बाबा ग्वालों के लोकदेवता है।

देव बाबा के भक्त चतुर्थी व पंचमी को चरवाहों को भोजन कराते हैं। इसे ग्वाला जीमण दावत कहा जाता है।
इसी कारण पशुओं की बीमारियों का सफल इलाज तथा कष्टो के निवारण करते थे। इसी कारण ग्वाला समुदाय में ग्वालों के पालनहार कष्ट निवारक देवता आदि नामों से प्रसिद्ध है।

देवबाबा ने अपनी मृत्यु के बाद अपनी बहन ‘एलादी’ को भात पहनाया था। देव बाबा की सवारी (वाहन) भैंसा (पाडा) होता है। इसमें उनके एक हाथ में झाड व दूसरे हाथ में लाठी लिए सवार प्रतिमा होती है। इनका स्थान नीम के पेड़ के नीचे स्थित होता है। इनका मुख्य स्थल नगला (भरतपुर) में है।

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लोकदेवता मामा देव जी

मामदेव जी एकमात्र राजस्थान के लोकदेवता है जिनकी मूर्ति न होकेर एक मात्र काष्ठ (लकड़ी) का तोरण होता है। मामा देव बरसात के लोकदेवता के रूप में राजस्थान में पूजे जाते है। मामदेव को प्रसन्न करने के लिए भैंसे का बलिदान दिया जाता है।

वीर बिग्गाजी/बग्गा जी

बिग्गाजी का जन्म जांगलप्रदेश (बीकानेर) के जाट परिवार में हुआ था। बिग्गा जी के पिता का नाम राममोहन था। वीर बिग्गाजी जाखड़ समाज के कुल देवता है। बीकानेर की श्रीडूंगरगढ़ तहसील का बिग्गा गाँव राजस्थान के लोकदेवता वीर बिग्गा के नाम पर आबाद हुआ।

वीर फ़त्ता जी

वीर फ़त्ता जी का जन्म साँथू गाँव (जलौर) के गज्जरनी परिवार में हुआ था। साँथू गाँव में लोकदेवता वीर फ़त्ता जी का मंदिर है जँहा प्रतिवर्ष भाद्रपद नवमी को विशाल मेला भरता है। राजस्थान के लोकदेवता वीर फ़त्ता जी ने अपने गाँव की मान मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। फ़त्ता जी ने शस्त्र विद्या का ज्ञान प्राप्त किया था

भुरिया बाबा/ गौतमेश्वर

भूरिया बाबा को मीणा जाति के लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मीणा जाति के लोग भूरिया बाबा कि कभी भी झूठी क़सम नहीं खाते हैं। गौतमेश्वर महादेव यानी भूरिया बाबा का प्रसिद्ध मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला में डूंगरपुर ज़िले में स्थित है। राजस्थान के लोकदेवता भूरिया बाबा शौर्य के प्रति है।

झुँझार जी

बाबा जुझार जी का जन्म स्वतंत्रता से पूर्व सीकर क्षेत्र में राजपूत परिवार में हुआ था। राजस्थान के लोकदेवता बाबा झुँझार जी का थाना प्राय खेजड़ी के पेड़ के नीचे होता है

ड़ूँगजी – जवाहर जी

ढूँढ जी जवाहर जी दोनों चाचा भतीजा धनी लोगों से धन लूटकर उनका धन गरीबों जरूरतमंदों में बाँट दिया करते थे। राजस्थान के लोकदेवता ड़ूँगजी – जवाहर जी शेखावाटी के रॉबिन हुड कहलाते थे। दुर्गा जी जवाहर जी का जन्म में बटोट, सीकर में हुआ था।

लोकदेवता इलोज़ी

राजस्थान के लोकदेवता मारवाड़ में ये छेड़-छाड़ के अनोखे लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मारवाड़ में इनके बारे में मान्यता है कि यह विवाहिता को दुलहन, नव दंपत्तियों को सूखद गृहस्त जीवन और बाँझ स्त्रियों को संतान देने में सक्षम है।

बाबा हरिराम जी

हरीराम बाबा के पिता का नाम राम नारायणमाता का नाम है चंदौली देवी था। हरीराम बाबा सर्पदंश का इलाज करते थे। हरिराम जी के मंदिर में साँप की बाँबी एवं बाबा की प्रतिक रूप में चरण कमल है। हरिराम जी की गुरू का नाम भूरा था।

केसरिया कुँवरजी

केसरिया कुंवर जी का जन्म ददरेवा (चूरू) में हुआ था। केसरिया कुंवर गोगा जी के पुत्र थे जो लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। केसरिया कुंवर के थान पर सफ़ेद रंग का ध्वज फहराते हैं।

रूपनाथ जी

रूपनाथ जी का जन्म कोलू गाँव (जोधपुर) में हुआ था। रूपनाथ जी की पाबूजी के भतीजे थे। रूपनाथ जी ने पाबूजी की मृत्यु का बदला जिंदल राव खींची को मार कर लिया था। रूपनाथ जी हिमाचल प्रदेश में बाबा बालक नाथ के रूप में पूजे जाते हैं।

भौमिया जी

भौमिया जी गाँव-गाँव में भूमि के रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। राजस्थान के लोकदेवता भौमिया जी को गाँव की सीमाओं का रक्षक माना जाता है।

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