Monday, June 1, 2020
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दैनिक समसामयिकी 29 May 2017

1. दक्षिण सागर पर जी-7 के रुख से भड़का चीन

  • पूर्व सागर और दक्षिण चीन सागर को विवादित और चिंताजनक बताने वाले ग्रुप-7 देशों के बयान से चीन भड़क गया है। उसने इसे असंतोषजनक करार देते हुए कहा है, इस तरह की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियां रोकी जानी चाहिए। 
  • चीन के विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा है कि पूर्व चीन सागर और दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखते हुए चीन संबंधित देशों से मतभेद दूर करने के लिए वचनबद्ध है। प्रवक्ता ने आशा जताई कि जी-7 देश और अन्य देश मामले में संयम बरतेंगे। संबंधित देशों की मतभेद दूर करने की कोशिश का सम्मान करेंगे। 
  • गैर जिम्मेदाराना बयान देने से बचेंगे। इससे पहले दुनिया के मजबूत और संपन्न सात देशों के समूह ने शनिवार को बयान जारी करके कहा था कि वे दक्षिण चीन सागर और पूर्व चीन सागर के हालातों से चिंतित हैं। उन्होंने विवादित क्षेत्र से सेनाओं को हटाने की भी जरूरत बताई। उल्लेखनीय है कि पूर्व सागर में चीन का जापान के साथ विवाद चल रहा है जबकि दक्षिण सागर में चीन का ब्रूनेई, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम और ताइवान के साथ विवाद है। 
  • दोनों ही सागर क्षेत्रों में चीन ने बड़ा सैन्य बंदोबस्त कर रखा है और उन्हें अपने अधिकार वाला क्षेत्र बताता है। अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में चीन के कृत्रिम द्वीप बनाने और वहां पर सैन्य सुविधाएं बढ़ाने की निंदा की है। यह सागर दुनिया के सर्वाधिक व्यस्त व्यापारिक मार्गो में से एक है। 
  • यहां पर अमेरिका अक्सर अपने युद्धपोत भेजता है जिसे लेकर उसकी चीन से तनातनी चलती रहती है। जी 7 में अमेरिका के अलावा फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, इटली और कनाडा हैं। इस समूह को अर्थव्यवस्था के लिहाज से दुनिया के प्रभावशाली संगठनों में से एक माना जाता है।

2. दक्षिण सूडान में इंसान से ज्यादा कीमती मवेशी

  • दुनिया के सबसे युवा देश दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र के अधीन तैनात भारतीय शांतिरक्षक दल के जवानों को अजीबोगरीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इस देश में तेल या जमीन पर अधिकार के लिए उतने झगड़े-फसाद नहीं होते, जितना मवेशियों को लेकर खूनी संघर्ष होता है। जवानों ने बताया कि गाय देने पर हत्या की सजा भी माफ हो जाती है। शादियां भी पशुओं की तादाद पर निर्भर होती हैं। 
  • भारतीय जवान संयुक्त राष्ट्र के दक्षिण सूडान मिशन (यूएनएमआइएसएस) के तहत तैनात हैं। राजधानी जुबा से तकरीबन 190 किलोमीटर दूर बोर में तैनात जवान मयूर शेकातकर ने बताया कि यहां दहेज के तौर पर मवेशी दिए जाते हैं। कम से कम 200 मवेशी होने पर ही यह तय किया जाता है कि युवक शादी के योग्य है या नहीं। 
  • ब्रिगेडियर केएस बरार दक्षिण सूडान को सीरिया के बाद सबसे खतरनाक बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘सूडान के कबायली समुदाय मवेशियों पर अधिकार को लेकर भिड़ते रहते हैं। पशुओं को इंसानों से ज्यादा कीमती समझा जाता है। हर किसी के पास हथियार होने से स्थिति और जटिल हो गई है। खूनी संघर्ष में अब तक सात भारतीय जवानों को जान गंवानी पड़ी है।’ 
  • दक्षिण सूडान में कृषि के लिए माकूल व्यवस्था नहीं होने के कारण पशुओं का महत्व बहुत ज्यादा है। शेकातकर बताते हैं कि शुष्क मौसम में कबायली समुदाय नील नदी की ओर पलायन करते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा टकराव होते हैं। 
  • संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान में 7,600 से ज्यादा भारतीय जवान तैनात हैं। मेडिकल ऑफीसर लेफ्टिनेंट कर्नल आनंद शेल्के ने वहां की भयानक स्थिति को आंकड़ों के जरिये स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ महीनों में उन्होंने दो हजार लोगों का इलाज किया है, जबकि इस अवधि में तकरीबन 10 हजार से ज्यादा मवेशियों के मामले उनके पास आए। यह स्थिति इंसानों से ज्यादा पशुओं के महत्व को दिखाता है। 
  • दक्षिण सूडान दो दशक से भी ज्यादा के खूनी संघर्ष के बाद वर्ष 2011 में सूडान से अलग हुआ था। इसके बावजूद यहां की स्थिति जस की तस बनी हुई है। कुछ मामलों में तो इस छोटे से देश के हालात और बदतर हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र यहां के लोगों के लिए लगातार काम कर रहा है। खासकर मानवीय मदद पहुंचाने और स्थानीय लोगों में सुरक्षा का भाव पैदा करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ रहे हैं। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद इस देश की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। 
  • अधिसंख्य आबादी कबायली होने के कारण इन पर काबू पाना अंतरराष्ट्रीय शांति रक्षक दल के सदस्यों के लिए मुश्किल काम साबित हो रहा है। इसके अलावा संक्रामक बीमारियां भी रुकावट डालती हैं।

3. दूसरा सबसे जटिल कर व्यवस्था वाला देश है भारत

  • भारतीय कर कानून को एशिया प्रशांत क्षेत्र में दूसरा सबसे जटिल कानून माना जाता है। पूर्व अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आम आदमी को कर के चंगुल से निकालने में नाकाम रहे हैं। 
  • आज हालात यह है कि आम भारतीय नागरिक इनकम टैक्स के रूप में मोटी रकम का भुगतान तो करता ही साथ ही अन्य सभी प्रकार टैक्स का भुगतान भी उसे करना पड़ता है।डेलायट के एक सव्रे में यह कहा गया है कि कराधान के मामले में जटिल क्षेत्रों में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है और कर की पण्राली काफी जटिल है। 
  • डेलायट के एशिया प्रशांत कर जटिलता सर्वे के अनुसार जापान, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया तथा दक्षिण कोरिया कर जटिलता सूचकांक में भारत के बाद आते हैं।इसमें कहा गया है, ‘‘दोनों देशों (चीन और भारत) में आधे से अधिक प्रतिभागियों का मानना है कि इन क्षेत्रों में पिछले तीन साल में कर जटिलता बढ़ी है।
  • यहां जटिलता से आशय संबंधित क्षेत्र में कर कानून एवं नियमों के विश्लेषण में कठिनाइयों से है। कर नीतियों में निरंतरता के संदर्भ में ज्यादातर प्रतिभागियों का मानना था कि पिछले तीन साल में भारत इस मामले में निरंतरता का अभाव रहा है। 
  • सर्वे में 300 वित्तीय और कर कार्यकारियों ने भाग लिया। इन लोगों से एशिया प्रशांत क्षेत्र में 20 देशों में मौजूदा और आगे कर मौहाल को लेकर उम्मीद के बारे में सवाल पूछे गए थे। इन प्रतिभागियों में से 147 के कामकाज भारत में हैं।

4. मौरीसस से आया सबसे अधिक एफडीआई

  • भारत में 2016-17 में मारीशस के रास्ते सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया। इस मामले में मारीशस ने सिंगापुर को पीछे छोड़ा है।
  • औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के आंकड़ों के अनुसार 2016-17 में मारीशस से देश में 15.72 अरब डालर का एफडीआई आया, जबकि सिंगापुर से यह आंकड़ा 8.71 अरब डालर का रहा। वित्त वर्ष 2015-16 में सिंगापुर पहले स्थान पर रहा था। 
  • विशेषज्ञों का कहना है कि सिंगापुर से एफडीआई में गिरावट की मुख्य वजह धन को घुमाफिरा कर भारत लाने से अंकुश को कर संधि में संशोधन एक वजह हो सकती है। संशोधित संधि इस साल फरवरी में अस्तित्व में आई है। 
  • मारीशस के प्रधानमंत्री प्रवींद्र कुमार जगन्नाथ भारत यात्रा पर आए थे। उन्होंने कहा था कि भारत के साथ वृहद आर्थिक सहयोग करार पर बातचीत चल रही है जिससे द्विपक्षीय निवेश और व्यापार संबंधों को प्रोत्साहन मिलेगा। 
  • वर्ष 2015-16 में सिंगापुर से 13.7 अरब डालर का एफडीआई आया था, जो 2006-07 के बाद से सिंगापुर के रास्ते आने वाला सबसे ऊंचा विदेशी निवेश है।

4. 1971 की जनगणना के आधार पर ही होगा नए राष्ट्रपति का चुनाव

  • देश का 14वां राष्ट्रपति चुनाव करीब 46 साल पुरानी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा। हालांकि संविधान के जानकारों का कहना है कि 1971 की आबादी के आधार पर होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में कई राज्यों को उतना प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, जितना कि इस राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें मिलना चाहिए था।
  • भारत के राष्ट्रपति का चुनाव परोक्ष निर्वाचन पण्राली के तहत निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इसमें मतदान करने वाले विधायकों एवं सांसदों के मतों का मूल्य भी राज्य की कुल आबादी के हिसाब से तय होता है। 
  • इसे ‘‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था’ कहते हैं। इस व्यवस्था के तहत राज्य की कुल आबादी में विधानसभा क्षेत्रों की संख्या का भाग दिया जाता है। फिर इससे प्राप्त आंकड़े को एक हजार से भाग देते हैं। इसमें प्राप्त संख्या ही राष्ट्रपति चुनाव में उस राज्य के विधायक के मत का मूल्य कहलाता है। 
  • इसी प्रकार सांसद का वेटेज, सभी राज्यों से चुने गए विधानसभा सदस्यों के मतों का कुल वेटेज जोड़ा जाता है। फिर उससे प्राप्त संख्या का राज्यसभा और लोकसभा के चुने गये सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है। इससे प्राप्त संख्या ही सांसद के मत का वेटेज होता है। यदि इस तरह से भाग देने के बाद 0.5 से ज्यादा बचता है, तो उनके वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है। 
  • भारत के जनगणना आयुक्त एवं महापंजीयक कार्यालय की जनगणना के अनुसार साल 1971 में देश की कुल आबादी 54.81 करोड़ थी, जबकि 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या बढ़कर 121.01 करोड़ पहुंच गई। 2017 में आबादी 128 करोड़ से ज्यादा हो सकती है। 
  • तुलानात्मक रूप से 1971 के बाद 2017 के बीच कुल 46 सालों में देश की आबादी करीब ढाई गुना तक बढ़ गयी है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करने वाले प्रतिनिधियों के मतों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा रहा है। 
  • यानी कुछ दिनों बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव भी 46 साल पुरानी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही होने वाले हैं। संविधान विशेषज्ञ डा. सुभाष काश्यप ने कहा, ‘‘यदि राष्ट्रपति चुनाव का आधार साल 1971 से बदलकर 2011 कर दिया जाए, तो बीच के इन सालों के दौरान बढ़ी आबादी को देखते हुये कई राज्यों के विधायकों के मतों का मूल्य और कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ जाएगी।’ 
  • कश्यप के मुताबिक 1971 की आबादी के आधार पर होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ऐसे राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा, जिनकी आबादी इन 40 सालों के दौरान तेजी से बढ़ी है।उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता एवं कानूनी विशेषज्ञ विराग गुप्ता ने कहा, ‘‘संविधान के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव के लिये जनप्रतिनिधियों के मतों के निर्धारण को लेकर यह स्पष्ट प्रावधान था कि राष्ट्रपति चुनाव सबसे नई जनगणना के आधार पर होगा। 
  • 1952 के राष्ट्रपति चुनाव का आधार 1951 की जनसंख्या थी, जबकि 1961 की जनगणना के आंकड़े समय पर नहीं मिल पाने के कारण 1962 का चुनाव भी 1951 की जनसंख्या के आधार पर कराये गये। इसके बाद 70 के दशक में हुए राष्ट्रपति चुनाव का आधार 1971 की जनगणना बनी।’ उन्होंने बताया कि इसके बाद 1971 की जनगणना को आधार बनाकर ही लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया गया और वर्ष 2004 तक के सभी आम एवं विधानसभा चुनाव उसी परिसीमन के आधार पर कराये गये। 
  • इस दौरान राष्ट्रपति चुनाव भी 1971 की जनगणना के अनुसार ही होते रहे। उल्लेखनीय है कि इसके बाद 2002 में केन्द्र की अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने संविधान में संशोधन करके यह तय कर दिया कि 2026 तक के सभी राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना के अनुसार ही होंगे। 
  • ऐसा इसलिये किया गया क्योंकि दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंतण्रके कार्यक्र मों को बेहतर तरीके से लागू किया था, इसलिये उसका पुरस्कार उन्हें इस प्रकार से दिया गया कि 2026 तक के राष्ट्रपति चुनाव में ऐसे राज्यों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व कम नहीं हो।

5. अब रॉकेट से कर सकेंगे अंतरिक्ष की सैर!

  • इसरो ऐसे स्वदेशी रॉकेट को विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसका वजन पूरी तरह से विकसित 200 हाथियों के बराबर होगा और यह रॉकेट भविष्य में भारतीय जमीन से भारतीयों को आकाश में लेकर जाएगा। 
  • आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र में देश में निर्मित सबसे भारी रॉकेट ‘‘भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान मार्क 3’ (जीएसएलवी एमके-3) विकसित किया जा रहा है। यह रॉकेट अब तक के सबसे भारी उपग्रहों को ले जाने में सक्षम होगा। 
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) विश्व के भारी वजन वाले एवं कई अरब डॉलर के प्रक्षेपण बाजार की नई दुनिया में कदम रखने की तैयारी कर रहा है।इसरो के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा, ‘‘हम यह सुनिश्चित करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि यह नया पूरी तरह आत्मनिर्भित भारतीय रॉकेट अपने पहले ही प्रक्षेपण में सफल हो।’ 
  • यह जीएसएलवी एमके-3 का पहला प्रायोगात्मक परीक्षण होगा, जिसका नाम पहले ‘‘प्रक्षेपण वाहन मार्क 3’ रखा गया था लेकिन एक दशक में सब सही रहने पर या कम से कम छह सफल प्रक्षेपणों के बाद इस रॉकेट का इस्तेमाल भारतीय जमीन से भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने में किया जाएगा।
  • नया रॉकेट भूस्थैतिक कक्षा में चार टन वर्ग के उपग्रह ले जाने में सक्षम है।
  • अनुमान है कि नए रॉकेट को विकसित करने की लागत 300 करोड़ रपए है, लेकिन एक भारतीय प्रक्षेपक का इस्तेमाल नई दिल्ली के संचार उपग्रहों को स्थापित करने में किए जाने पर देश लगभग इतनी ही बचत कर लेगा।
  • इस समय भारत भारी चार टन वर्ग के संचार उपग्रहों को स्थपित करने के लिए दक्षिण अमेरिका के कोउरोउ से प्रक्षेपित फ्रेंच एरियन 5 का इस्तेमाल करता है।
  • जीएसएलवी एमके-3 एक ऐसा रॉकेट है जिसे शुरुआत से भारत ने विकसित एवं डिजाइन किया है।
  • नए जीएसएलवी मार्क-3 का वर्ष 2014 में यह समझने के लिए एक उपकक्षीय सफल प्रक्षेपण किया गया था कि यह वायुमंडल में कैसा प्रदर्शन करता है।
  • जीएसएलवी एमके-3 की लंबाई 43 मीटर है, जो तीन बड़े भारतीय रॉकेटों में सबसे छोटा है लेकिन यह भारत के सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी एमके 2 से 1.5 गुणा अधिक है और पीएसएलवी से दोगुना है।

6. विज्ञान में भी तेजी से बढ़ रहा स्वदेशी मंत्र

  • इलाज की स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर सरकार के जोर का असर दिखा रहा है। मधुमेह (डायबिटीज) और खून के थक्के जमने से रोकने वाली दवाओं समेत भारत में विकसित दवा और टीके स्वास्थ्य खर्च भी कम करने में कामयाब हो रहे हैं। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने डेंगू और मलेरिया का टीका तैयार करने में उल्लेखनीय प्रगति कर ली है।
  • वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) के महानिदेशक गिरीश साहनी ने बताया कि ये दवाएं आम लोगों के इलाज का खर्च घटाने में कामयाब हो रही हैं। हाल में उनकी प्रयोगशालाओं में विकसित मधुमेह की आयुर्वेदिक दवा बीजीआर-34 को बाजार में उतारा गया है। जहां मधुमेह की दवाएं बेहद महंगी हैं, यह महज पांच रुपये में उपलब्ध हो रही है। 
  • यह दवा मधुमेह के टाइप-2 मरीजों में सहायक उपचार के तौर पर प्रभावी हो रही है।1उन्होंने खून के थक्के जमा होने से रोकने वाली दवा स्टैप्टोकिनेस को भी बेहद उल्लेखनीय बताया। इस दवा की मदद से लाखों लोगों की जान बचाई जा सकी है। 
  • उन्होंने दुनिया की पहली बिना स्टीरोइड की गर्भरोधी गोली तैयार करने के लिए भी भारतीय वैज्ञानिकों की सराहना की। यह गोली पुरानी दवाओं के मुकाबले महज दस फीसद कीमत में ही उपलब्ध हो जाती है। भारत में पिछले दिनों विकसित किए गए रोटा वायरस के टीके ने कीमत को कई गुना घटा दिया। 
  • इसी वजह से सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में रोटा वायरस टीका शामिल करना संभव हो सका है। यहीं विकसित एक दिन में डेंगू का पता करने वाली जांच किट भी काफी प्रभावी है। भारतीय वैज्ञानिकों ने डेंगू और मलेरिया का टीका तैयार करने के लिहाज से भी उल्लेखनीय प्रगति की है। इन तकनीक को खोज कर सीएसआइआर को बहुत राजस्व तो नहीं मिला, लेकिन लोगों को बहुत लाभ मिला है। 
  • सीएसआइआर की सिर्फ छह तकनीकों से ही लोगों को 32 हजार करोड़ से अधिक का फायदा हुआ है। बीजीआर-34 की बिक्री से सीएसआइआर को तीन फीसद रॉयल्टी मिल रही है। सीएसआरआर इस साल अपनी स्थापना की प्लेटिनम जुबली मना रही है।

7. एनएसई अल्गो ट्रेडिंग को लेकर तेज हुई जांच

  • भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) और बाजार नियामक सेबी ने एनएसई के अल्गो ट्रेडिंग सिस्टम में खामियों की जांच तेज कर दी है। ये गड़बड़ियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के को-लोकेशन फैसिलिटी के जरिये उपलब्ध कराई जाने वाली कंप्यूटर जनित हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग के जरिये अंजाम दी गईं। 
  • इस मामले में एनएसई के बोर्ड सदस्यों और पूर्व प्रमुख रवि नारायण समेत कई बड़े अफसर की भूमिका भी जांच के दायरे में है। नारायण 2010-13 के बीच एक्सचेंज के एमडी व सीईओ थे।1वित्त मंत्रलय भी इस मामले पर नजर रखे हुए है। मंत्रलय चाहता है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) तेजी से इस जांच को निपटाए, क्योंकि इसमें कारोबार के हिसाब से देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज शामिल है। 
  • यह पूरे बाजार के रुख पर असर डाल सकता है। एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि सेबी ने इस संबंध में एक्सचेंज व नारायण समेत कई शीर्ष अफसरों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें शीर्ष प्रबंधन से जुड़े कुछ पूर्व आला अफसर भी शामिल हैं। बाद में इन सभी को समन भी जारी किए जाएंगे। 
  • बाजार नियामक को सीबीआइ जैसी एजेसियों और कुछ सांसदों से भी इस मामले में रेफरेंस मिले हैं। इन पर सेबी ने 2015 में ही जांच शुरू कर दी थी, मगर अब तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया है जो किसी निष्कर्ष पर ले जाए।1जहां तक रिजर्व बैंक का सवाल है, तो वह एनएसई पर होने वाले करेंसी और ब्याज दर से जुड़े डेरिवेटिव मार्केट पर अल्गो ट्रेडिंग गड़बड़ियों के प्रभाव की छानबीन कर रहा है। 
  • इससे पहले केंद्रीय बैंक ने सेबी से पूछा था कि क्या बाजार के इन सेगमेंट पर एनएसई के सिस्टम में खामी का असर पड़ा है या नहीं। एक्सचेंज ट्रेडेड करेंसी व इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव मार्केट सेबी और आरबीआइ के दोहरे नियंत्रण में आते हैं।
  • बोर्ड के भीतर ही पद छोड़ने का दबाव : सूत्रों की मानें तो एक्सचेंज के बोर्ड के भीतर ही दबाव बन रहा है। इसके कुछ शेयरधारक और अन्य हितधारक चाहते हैं कि एक्सचेंज के कई शीर्ष और मध्यम दर्जे के अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए। 
  • हालांकि एक्सचेंज ने नारायण और अन्य को बाहर किए जाने के किसी भी कदम का जोरदार विरोध किया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे उलझन वाली स्थिति बताया। उसने कहा कि संदेश देने के लिए कड़ा कदम उठाया जाना जरूरी है। दुनिया को यह बताना जरूरी है कि एक्सचेंज अपनी साफ-सुथरी छवि को लेकर गंभीर है। 
  • एनएसई किसी भी तरह की कमी पर पर्दा डालने के बजाय उस पर कार्रवाई करने में सक्षम है। एक्सचेंज के प्रवक्ता ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि यह मामला अभी नियामक और एनएसई के बीच वार्ता का है।

8. बेरोजगारी से ज्यादा गंभीर समस्या है कम रोजगारी : नीति आयोग

  • देश में बेरोजगारी से ज्यादा गंभीर समस्या है कम रोजगारी। एक आदमी जितना काम कर सकता है, उस काम को दो या उससे ज्यादा लोग कर रहे हैं। यह कहना है सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग का। इसने एक उदाहरण देते हुए बताया है कि सर्विसेज कंपनियों के 98 फीसदी कर्मचारियों का सेक्टर के कुल आउटपुट में सिर्फ 62 फीसदी योगदान है। 
  • आयोग की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब कम नौकरियां पैदा होने के कारण विपक्षी दल केंद्र सरकार की आलोचना कर रहे हैं। 
  • आयोग के तीन साल के एजेंडा रिपोर्ट में ज्यादा उत्पादकता और अधिक वेतन वाली नौकरियां सृजित करने पर जोर है। यह रिपोर्ट 2017-18 से 2019-20 के लिए है। आयोग की गवर्निंग काउंसिल को यह ड्राफ्ट रिपोर्ट पिछले महीने वितरित की गई। काउंसिल में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री हैं। 
  • आयोग का कहना है कि चीन में कामकाजी लोगों की उम्र ज्यादा है, भारत की कम। इसलिए वहां की बड़ी कंपनियों को यहां बुलाना चाहिए। चीन, सिंगापुर, ताइवान, दक्षिण कोरिया का अनुभव बताता है कि मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा से ही अच्छे वेतन वाली नौकरियां मिलती हैं। 
  • भारतमें श्रम सस्ता होने की बात सही नहीं : एसोचैम उद्योगचैंबर एसोचैम के अनुसार यह कहना गलत है कि भारत में श्रम सस्ता है। चैंबर के प्रेसिडेंट संदीप जाजोदिया ने कहा, हमारे यहां श्रमिकों की उत्पादकता बहुत कम है। दूसरे देशों में जो काम एक आदमी करता है, उसे यहां कई लोग मिलकर करते हैं। बिजली और कर्ज भी बहुत महंगा है, इन्फ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की लागत भी अधिक है जिससे घरेलू इंडस्ट्री प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाती। 
  • जितनीआईटी नौकरियां जाएंगी, उससे ज्यादा मिलेंगी : कोटक इंस्टूट्यूशनल इक्विटीज ने एक रिसर्च नोट में लिखा है कि आईटी कंपनियों में नौकरियां जाने के बावूजद यह सेक्टर जॉब के लिहाज से अच्छा रहेगा। इन कंपनियों में जितनी नौकरियां जाएंगी, उससे ज्यादा लोगों को मिलेंगी। 
  • हालांकि ऑटोमेशन का असर भी देखना होगा। हर बार आईटी कंपनियों में सालाना अप्रेजल के बाद 1-3% लोग हटाए जाते हैं। इस बार यह आंकड़ा 2-4% रह सकता है। इसके मुताबिक इंजीनियरिंग और आरएंडडी में जॉब की संख्या 7-9% और घरेलू आईटी-बीपीओ सेगमेंट में 5-7% बढ़ने की उम्मीद है।
  • 2011-12 के एनएसएसओ सर्वे के अनुसार 49% लोग कृषि क्षेत्र में काम कर रहे थे, लेकिन इस सेक्टर का जीडीपी में योगदान सिर्फ 17% था। 
  • 2010-11 में मैन्युफैक्चरिंग में 72% लोग उन फर्मों में थे जिनमें 20 से कम कर्मचारी हैं। मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में इनका योगदान सिर्फ 12% था। 
  • 2006-07 का सर्विसेज कंपनियों का सर्वे बताता है कि 650 बड़ी कंपनियों का आउटपुट में योगदान 38% था, जबकि इनमें सेक्टर के सिर्फ 2% लोग थे।

Source of the News (With Regards):-  compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran (Rashtriya Sanskaran), Dainik Bhaskar (Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik (Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times (Hindi& English)

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